Expression of PS Malik

PS Malik Speaks

Expression of PS Malik - PS Malik Speaks

Labyrinth Meditation: A Silent Revolution

Labyrinth Meditation: A Silent Revolution

Labyrinth meditation is an unusual meditational method. It is a rare combination of Yoga’s Pranayama, Sufi’s whirling and Osho’s Dynamic meditation. Whenever you feel helpless in abandoning your unruly thoughts you may choose Labyrinth Meditation. Its practice has a tremendous effect on the internal awakening.

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STEP BY STEP CURE OF DENGUE

Dengue is a killer disease. It has killed thousands of people. Now it is attacking new ones. It may be anyone. The Hospitals are overcrowded and have no place for the new patients. People are scared. They do not know what to do. So this video is released to help people have a speedy and remarkable recovery from a Dengue infection. The complete information is also available in pdf format at www.psmalik.com.

THE FIRST EVER COMPLETE PROTECTION AGAINST DENGUE

It is first remedy in the world that protects you from Dengue even before it could attack you. It prevents any possible outbreak of Dengue. It protects you from Dengue in entirety.
यह दुनिया की पहली दवाई है जो डेंगू के होने से पहले ही आपको सुरक्षित कर देती है। इसे लेने के बाद डेंगू नहीं हो सकता है। यह डेंगू के खिलाफ सम्पूर्ण सुरक्षा है।

HAIR FALL OR HAIR LOSS: A COMPLETE SOLUTION

In modern times the Hair fall or the Hair Loss has become a social issue in addition to its being a medical problem for ages. There are as many reasons for hair fall as many are there the people suffering from it. This Video has considered all physical, mental and emotional conditions of the patients in devising their remedies for their falling hair. Watch the video for curing it.

DEPRESSION: A CURE BY HOMEOPATHY

There are numerous techniques of revival from the depression. Using your mind through subconscious mind is one of them while having the homeopathic medicines is the other. This video has explained all major types of Depressions and their corresponding Homeopathic Remedies. A thousands of people have benefitted from them.

10 TIPS FOR SURE SUCCESS

10 TIPS FOR SURE SUCCESS

SUCCESSFULS

Hard work does not give you success. Hard work is one of the required inputs but it is not all. A lot many other things are also required in order to get a sure success. The success has to be gained wisely. Pratap Shree tells what else is required in this video:

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Rajniti Aur Ramleela

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राजनीति और रामलीला

2015 के विधानसभा चुनावों के नतीजे बहुत चौंकाने वाले नहीं हैं। इन नतीजों की पूर्वपीठिका स्वयँ भाजपा की ही लिखी हुई है। शुरू से यह लगभग निश्चित दिखाई दे रहा था कि देश के अन्य भागों की तरह ही भाजपा दिल्ली चुनावों को जीतने की ओर चल पड़ी है। जीत भी साफ दिखाई दे रही थी। तभी किसी ने एक पैराशूटर को भाजपा चुनावों में उतार दिया। श्रीमति किरण बेदी को भाजपा की कमान सौंप दी गई। उसी क्षण से सब कुछ बदलने लगा।

श्रीमति किरण बेदी को चुनावों में उतारने से जनता के बीच बहुत गलतफ़हमी हुई है। केजरीवाल, अन्ना हजारे और अंत मे भाजपा कोई भी घर इन्होंने छोड़ा नहीं है। दिल्ली की जनता नहीं चाहती थी कि उसे एक बार और किसी नाम के सहारे छला जाये।

दूसरी महत्तवपूर्ण बात थी कि सारे भारत में भाजपा मोदी के नाम के सहारे लड़ रही ऐसा लगा कि भाजपा श्रीमति किरण बेदी को श्री नरेन्द्र मोदी से भी बड़ा यौद्धा मान बैठी है और अब मोदी की नैया को बेदी पार लगाएगी। मोदी में अविशवास करने का नतीजा किरण बेदी थी।

एक तीसरा कारण भी था। ऐसा लगा कि राजनीति नहीं रामलीला की जा रही हो जहाँ केवल संवादों और मेकअप के सहारे ही कलाकार उत्तम अभिनय की ट्रॉफी जीत लेते हैं। मतदाताओं ने सिद्ध किया कि वे अब राजनीति के धोखे में रामलीला को नहीं जिताएँगे।

चौथा कारण आम आदमी पार्टी का कुशल बर्ताव था। यह संदेश अब साफ हो जाना चाहिये कि जनता राजनीति के नाम पर अब छिछोरी हरकतों को स्वीकार नहीं करने वाली है। अब इस प्रकार के बैंड बाजों का प्रयोग त्याग ही दिया जाना चाहिये।

और अंत में, यह केवल भाजपा की उस सोच की ही हार नहीं है जिसमें उसने सब्सटान्स से अधिक ध्यान स्टाईल पर देना शुरू कर दिया था बल्कि इस खेल के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं। श्री मोदी की राजनीतिक दिक्कतें और बिहार मे विपक्ष का मनोबल अब बढ़ने वाले हैं।

और अँत में अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर भी जहाँ भारत के प्रधानमंत्री मोदी की तूती बोलने लगी थी वहाँ भी इस बात को नोट किया जाएगा। ऐसे में हम सब को भारतीय हितों के लिये एक होकर काम करना होगा। हम घर में राजनीति करें या रामलीला करें बाहर जगत में हमें मजबूती से एक साथ खड़े रहना होगा। मोदी जी, यही जरूरी भी है।

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हवाई अड्डों को घूरते लाल बुझक्कड़

हवाई अड्डों को घूरते लाल बुझक्कड़

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बचपन की किस्से कहानियों से निकलकर लाल बुझक्कड़ आजकल सर्वत्र फैल गए हैं।

कभी वे लोग शादी से पहले डॉक्टरी सर्टिफिकेट को अनिवार्य बना देते हैं, कभी 100/- प्रति माह वाले केबल को जनता के लाभ के लिये 3000/- की सेट टॉप बॉक्स के साथ 875/- प्रतिमाह भुगतान करने का हुकुम सुना देते हैं। सुना है अब वे दिल्ली के हवाई अड्डों को सुधारने के पुण्य काम में लग चुके हैं।

अखबार में खबर थी कि लोग हवाई जहाज़ से यात्रा करते हैं उनके परिचित और परिवार के लोग उन्हें छोड़ने और लेने के लिये हवाई अड्डों पर आते हैं जिससे वहाँ भीड़ हो जाती है। तो ये हाकिम लोग इस भीड़ को इकट्ठे नहीं होने देना चाहते। इसलिये ये ऐसा कुछ करना चाहते हैं लोगबाग हवाई अड्डों पर भीड़ ना करें। सुना है कि ऐसा कोई हुकम आने वाला है कि जो भी वहाँ पाँच मिनट से ज्यादा रुकेगा उससे बहुत भारी भरकम पैसा वसूला जाएगा – सैकड़ों रुपये प्रति पाँच मिनट के हिसाब से।

जिस मंत्री ने, जिस समूह ने, इंजिनियर ने, प्रशासनिक अधिकारी ने इस 6,300 वर्ग एकड़ भूमि पर नक्शे खिंचवाए होंगे उसके दिमाग में क्या भविष्य का कोई अँदाजा नहीं था। क्या उसे नहीं सूझा था कि यात्री आएँगे तो उन्हें लेने और छोड़ने वाले भी आएँगे और वे अपने वाहनों में आएँगे? यदि उसे ऐसा अँदाजा नहीं था तो उसकी गलती का खमियाजा अब आने वाली पीढ़ियाँ क्यों भुगतें?

आप यात्रा किराए में फ्यूल खर्च के ऊपर भी जन-सुविधाओं के नाम पर अनाप शनाप कर लगाते हैं। वे जन-सुविधाएँ कहाँ है यदि उन्हें आप उनकी गाड़ी भी कुछ देर खड़ी नहीं करने दे रहे हैं।

यह जो पाँच मिनट की समय सीमा बाँधी गई है यह केवल लाल बुझक्कड़ लेवल के दिमाग ही कर सकते है। क्या उन्होंने खुद इसका ट्रायल स्वयँ पर करके देखा है? यदि हाँ तो वे सामने आकर बताएँ और करके दिखाएँ। आलीशान दफ्तरों में बैठकर तुगलकी आदेश ना पारित करें।

वैसे भी जब तक लाल बुझक्कड़ी दिमाग समस्यओं का हल खोजने में लगे रहेंगे और और उन्हें तुगलकी ताकत मिली रहेगा तब तक इस जनता को चैन नहीं मिलेगा। इन लोगों को इनकी असफलताओं की सजा दी जानी चाहिए ताकि आगे आने वाले इनके शिष्य ऐसी लापरवाही फिर ना करें और जनता का स्वेच्छाचारी शोषण रोका जा सके।

वर्तमान में एक रिसपॉन्सिव सरकार के होते हुए ऐसा सोचा जा सकता है कि सरकार इस पर समुचित निर्णय लेगी और इन तुगलकी बुझक्कड़ों पर लगाम कसेगी।

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मैं ख़्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है

मैं ख़्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है

khwab

मैं ख़्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है,

सरे-आईना मेरा अक्स है, पसे-आइना कोई और है।

 

 

 

मैं किसी की दस्ते-तलब में हूँ तो किसी की हर्फ़े-दुआ में हूँ,

मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे माँगता कोई और है।

 

 

 

अजब ऐतबार-ओ-बे-ऐतबार के दरम्यान है ज़िंदगी,

मैं क़रीब हूँ किसी और के, मुझे जानता कोई और है।

 

 

 

तेरी रोशनी मेरे खद्दो-खाल से मुख्तलिफ़ तो नहीं मगर,

तू क़रीब आ तुझे देख लूँ, तू वही है या कोई और है।

 

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http://psmalik.com/ghazals-shayari/239-khayal-kisi-aur-ka

HOMEOPATHY FOR HAIRFALL

HOMEOPATHY FOR HAIRFALL

Dr. PS Malik

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Alopecia means hair loss. Patients seeking homoeopathy for alopecia are increasing. The testimony of success to cure permanently is a rapid, gentle and permanent manner.

If alopecia is due to skin conditions like eczema, dermatitis and fungal infection, remedy is selected based on these. Along with indicated remedy mother tinctures enhancing hair growth, controlling dandruff, promoting blood supply through peripheral vessels, acting as hair tonic, etc. are usually recommended to use externally mixed with some oil for consistency.

ACIDUM FLOURICUM

Alopecia with great dryness of hair and soft nails. Falling out of hair after fevers. Children with a tendency to patchy bald areas, without a definite skin disease. But it is patchy areas of thinning of the hair rather than actual baldness.

ARSENICUM ALBUM

Falling of hair with convalescence. Sometimes from skin conditions like eczema, Urticaria, herpes zoster etc. with characteristic thirst.

GRAPHITES

Hair of vertex, sides and beard turns grey early and falls out, with matted and brittle hair. Bald patches at the beard and chin.

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http://psmalik.com/homeopathy-world/238-homeopathy-for-hairfall

http://worldview.psmalik.com/homeopathy-for-homeopathy/

TREATMENT OF EBOLA

TREATMENT OF EBOLA VIRUS DISEASE

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  • Ebola is a disease of humans and other mammals caused by an Ebola virus.
  • The symptoms start appearing two days to three weeks after getting the infection of this virus.
  • Its immediate symptoms are fever, sore throat, muscle pain and headaches.
  • Around this time, affected people may begin to bleed both within the body and externally. This is called internal and external hemorrhage.
  • Death, if it occurs, is typically 6 to 16 days from the start of symptoms and often due to low blood pressure from fluid loss.

 EBOLA

BUT DON’T BE SCARED, HOMEOPATHY HAS THE ANSWER

The first treatment is likely to be given with the help of ARSENICUM ALBUM and ACONITUM.

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QUACKS, MEDICAL MAFIA AND THE GOVERNMENT

QUACKS, MEDICAL MAFIA AND THE GOVERNMENT

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  • There is an acute shortage of doctors in India.
  • Thousands of patients die because doctors were not available to them.
  • The government is going to allow semi-skilled doctors to provide medical care where the skilled ones are not available.
  • Those who see this profession as a minting occupation than an opportunity to serve have started raising hue and cry.
  • 45% of medical trade is occupied by very simple prescription e.g. pain killers, gastric problems, depression problems etc.
  • Specialized medical treatment share is only 8.7% of the complete medical trade.
  • As per views by a survey 87% consumers are not satisfied the way they were treated with by these so called Trained Medical Experts.

THE COMPLETE ARTICLE

Like other developing countries India is also facing an acute shortage of trained medical practitioners. As per statement of the concerned minister in November 2011 in India there was 1 doctor for 2000 patients. This medical population is usually concentrated in big cities. The picture assumes a more horrible face in villages and small towns. As per a report in The Guardian newspaper in 2009 in India one infant died every 15 seconds in want of a proper medical help.
To improve upon this grim scenario the government has decided:

  • Giving AYUSH docs the right to prescribe allopathic drugs after a one year course.
  • A compulsory Bachelor of Rural Health Care course
  • AIIMS-like institutions in various parts of the countries. They are going to be located in Patna, Bhopal, Bhubaneshwar, Jodhpur, Raipur and Rishikesh.
  • A compulsory bond that will force the docs to return to India after completing their medical education abroad.
  • Setting up of a centralized National Commission of Human Resources and Health which will have all other medical bodies in the country under its jurisdiction.

In response to this govt. initiative some people have started criticizing it. In their arrogant style they have coined a term – Hybrid Doctors. Critics are mostly those groups and people who are least bothered about the welfare of the country or the human beings but are largely guided by their capabilities of earning money and adversities related to it. For this group of thinkers (!) they and their needs always stand first in the queue.
The number of doctors are meagre to meet the needs of the society. They are less than 1/20th in number than they are actually required. How to fill the gap? The critics are not coming forward with any alternative plan to provide medical help to the needy ones. They raise their voice not guided by the welfare of population but by their petty financial interests. They find themselves intimidated against their monopoly in this field of health-care.
When talked to the public these medical angels are reported to have shown the most barbaric faces when a patient is confronted to them. The behaviour of doctors in hospitals is reported to quite monarchic. They behave not as doctors but as lords. They are found busy in pursuit power and money. Therefore, any argument led by them should not allowed to be viewed as celestial and motivated by divinity.
The major part of healthcare is related to general problems like headaches, indigestion, workloads. For this reason a major chunk of the medicines is occupied by the medicines sold over the counter. Even the chemists sell these medicines after evaluating the pathology of a person. Specialty And Super – Specialty Treatment and medicines are related to only a very small part of this medical – trade. So the real threat to the monopoly to the business of such critics is in fact, negligible.
AYUSH doctors are qualified doctors although in a different discipline of medical care. It was this science of these AYUSH doctors that has served the humanity for thousands of years prior to birth of these critics’ science. It was this noble science of these AYUSH doctors which has produced not only best of medical experts but the best of human beings also who did not bother more for the money than for human lives. Therefore, critics must not be afraid of welfare of the public.
The government is right in its approach and direction. Such monochromatic thinkers should be discouraged because their arguments are not for the benefit of poor and needy ones.

http://psmalik.com/2013-06-11-19-32-17/15-generaltopics/233-quacks

सुनिये सरकार जी

सुनिये सरकार जी

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  • किसी विद्वान ने यह सलाह दी है कि इस देश में विवाह पूर्व डॉक्टरी परीक्षण आवश्यक कर दिया जाना चाहिये ताकि लड़का और लड़की को जाँच कर पता लगाया जा सके कि उन्हें कोई यौन समस्या तो नहीं है। तर्क दिया गया है बड़ी संख्या में शादियाँ केवल यौन-अक्षमताओं के चलते टूट जाती हैं इसलिये यदि शादी से पहले ही मेडीकल परीक्षण द्वारा यह सुनिश्चित किया जा सके कि दोनों पक्षों को यौन-अक्षमता नहीं है तो अनेक शादियों को टूटने से बचाया जा सकता है।
  • यह मान लेने के तार्किक आधार हैं कि सभी विवाहित लोगों की संख्या के मुकाबले इन विद्वान महाशय द्वारा देखे गये उन उदाहरणों की सँख्या बहुत ही कम होगी जिनके आधार पर यह नतीजा निकाला गया है। मुश्किल से एक प्रतिशत के सौंवे हिस्से से भी कम ही होगी। तो ऐसा क्या कारण हो गया था कि एक नगण्य सी संख्या को देखने भर से आपने सब लोगों के लिए एक अनिवार्य शर्त गढ़ने की बात तक सोच डाली।
  • दो तीन साल पहले तक पूरा घर 100-200 रुपये महीना पर केबल देख लेता था। अचानक कुछ विद्वानों को लगा कि इस विषय पर एक सामाजिक क्रांति की जा सकती है। उन्होंने ‘गरीबों का हित’, ‘आपके अधिकारों की सुरक्षा’, ‘चयन का अधिकार’ आदि शब्द बार बार कहे और उन शब्दों के नाम पर पता नहीं क्या-क्या किया गया कि आज उसी केबल को दस-बारह गुणा पैसा खर्च करके देखा जाने लगा। हजारों केबल वाले बेरोज़गार हो गये हैं। हाँ कुछ बड़े लोगों की जेबों में अब अधिक धन अधिक आसानी से पहुँचने लगा है। हम जनता को बताया दिया गया है कि हमारा भला हो गया है।
  • दिल्ली में एक बादशाह हुए हैं शाह आलम (1728-1826 ई)। उनके घटते हुए प्रभाव को लेकर उनके बारे में कहावत थी कि हुकूमत ए शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम। तो क्या आज भी कुछ विद्वान लोग ऐसे हैं जो हुकूमत ए हिन्दुस्तान को सिर्फ पालम तक फैला हुआ मानते हैं।
  • ऐसा अंदेशा है कि जैसे ही यह साहेब वाला हुक्म लागू होगा तो तत्काल ही Sexual Fitness Certificate जारी करवाने वाले गिरोह विकसित हो जाएंगे जैसे कि प्रदूषण नियंत्रण वालों के यहाँ हो गये हैं। मोटी मोटी रकमें इधर से उधर होंगी सर्टिफ़िकेट्स जारी किये जाएंगे और भ्रष्टाचार का एक और चैनल शुरू हो जाएगा।

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http://psmalik.com/charcha/230-sexual-fitness-certificate

मोदी का Niche Market प्रयोग

मोदी का Niche Market प्रयोग

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  • अंग्रेजी में नॉर्डिक मूल का एक शब्द है – निच् (Niche)। जब इसे बाजार प्रणाली के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है तो यह कहलाता है निच् मार्केट (Niche Market)।
  • उदाहरणार्थ बाजार में दस फूड सप्लीमैंट्स हैं जो बालकों को प्रचुर कैलशियम उपलब्ध करवाने का दावा करते हैं। दसों फूड सप्लीमैंट्स में बिक्री के लिए घमासान मचा हुआ है। प्रचार पर भारी पैसा खर्चा किया जा रहा है। अचानक एक फूड सप्लीमैंट का निर्माता जनता को कहना शुरू करता है कि उसके सप्लीमैंट में एक ऐसा साल्ट भी है जो सप्लीमैंट वाले कैलशियम को शरीर तक पहुँचाता है। बिना साल्ट वाला कैलशियम किसी मतलब का नहीं है। वह यूँ ही शरीर से बाहर फेंक दिया जाएगा। साल्ट के बिना कैल्शियम तो बस मिट्टी जैसा है। अब उपभोक्ता सब कुछ भूलकर साल्ट वाले कैलशियम को खरीदने के लिए दौड़ पड़ते हैं। साल्ट वाला सप्लीमैंट बाजी मार लेता है। शेष सप्लीमैंट समान गुणवत्ता के होते हुए भी पीछे रह जाते हैं।
  • इस उदाहरण वाली बाजार प्रणाली में न सिर्फ प्रोडक्ट बेचा जा रहा है बल्कि एक ऐसी कसौटी भी साथ दी जा रही है जिस पर उस उत्पाद को कसा जाएगा। सामान्य नियमों के तहत् यह कसौटी उपभोक्ता की खुद की होनी चाहिए परन्तु बाजार की चतुराई यह है कि प्रोडक्ट का निर्माता स्वयं ही इस कसौटी को रच कर उपभोक्ता को थमा देता है। अब प्रोडक्ट भी उसी का है और प्रोडक्ट को जाँचने की कसौटी भी उसी निर्माता की है। अतः अब लाभ भी निश्चित ही उसी का हो जाता है। चुनाव 2014 में यही मोदी ने भी किया है।
  • मोदी का निच् मार्केट था – विकास। इसे उन्होंने कुछेक सहायक सब- निच् मार्केट (Sub Niche Market) प्रत्ययों जैसे ‘सबका विकास सबका साथ’, ‘भारतीय गौरव’, ‘सरकारी अकर्मण्यता के प्रति रोष’ आदि के साथ जोड़ दिया। और कमाल हो गया। विरोधियों को सूझा ही नहीं कि साम्प्रदायिकता आदि को लेकर जिस मोदी विरोध की तैयारी उन्होंने कर रखी थी और जो अब अचानक भोथरे हो गए थे उनका क्या किया जाए ?  और जब तक विपक्ष इस किंकर्त्तव्यविमूढ़ता से बाहर आता तब तक चुनाव खत्म हो चुके थे। इस नई व्यवस्था में चहुँ ओर मोदी ही मोदी हैं।
  • विकास की जिस अवधारणा को मोदी जी अवतरित करना चाहते हैं वह मूल स्वरूप में लगभग वही है जिसे नरसिंह राव सरकार ने शुरू किया था और मनमोहन सरकार ने जिसे पाला पोसा था। अब तक जिन सुधारों की बात मोदी जी ने की है वे केवल कॉस्मैटिक सुधार हैं। मोदी द्वारा प्रतिपादित सुधार नरसिंह-मनमोहन सिद्धाँत से आमूल चूल भिन्न नहीं हैं। मनमोहन सिंह के लिये अस्वीकार्यता और मोदी की स्वीकार्यता के बीच केवल बालिश्त भर का ही अंतर है। इस सिद्धाँत का प्रतिछोर अभी भी सामाजिक न्याय का सिद्धाँत है जो आज के समय में भी केवल सपा और बसपा ने ही थाम रखा है। यदि मोदी का विकास इस देश का सपना है तो सामाजिक न्याय यहाँ की हकीकत है। जिस समय भी आप नींद की खुमारी से बाहर आएंगे तो हकीकत की जमीन पर ही खड़ा होना होगा।

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कालाधन सिर्फ काला नहीं होता

कालाधन सिर्फ काला नहीं होता

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जो भी धन स्थापित व्यवस्थाओं के उल्लंघन से हासिल किया जाता है वही काला धन होता है। सरल शब्दों में कहें तो बिना टैक्स चुकाए जो धन सरकार से छिपाया जाता है वह काला धन होता है।

 

जब सरकार की नीतियाँ अस्थिर, शोषणकारी और दमनपूर्ण होंगी और उसके साधन हर स्थान पर उपलब्ध नहीं होंगे तो जनता का सक्षम वर्ग भविष्य की सुरक्षा के लिए अपनी आय को छुपा लेता है और काले धन का निर्माण करता है। ऐसा भी संभव है कि आय उन साधनों से हुई हो जिन्हें सरकार ने प्रतिबंधित किया हुआ है। जैसेकि प्रतिबंधित वस्तुओं की बिक्री करके या घूस आदि लेकर।

 

काले धन के कई प्रकार हैं।

  • आम लोगों का काला धन
  • उद्योगपतियों का काला धन
  • राजनेताओं का काला धन
  • ब्यूरोक्रेट्स का काला धन
  1. आम लोग अपनी घोषित कमाई के अलावा भी एकाध काम जैसे – सुबह अखबार बेचकर, लिफाफे बना कर, छोटी मोटी मशीनें लगा कर, कोई टॉफी-बिस्कुट की दुकान खोलकर आदि करके कुछ कमाई कर लेते हैं और सरकार से छुपा लेते हैं। इस धन का मुख्य उद्देशय अपने सामाजिक भविष्य को सुरक्षित करना होता है। आकार में यह कालाधन इतना सूक्ष्म है कि सरकारें इस पर आमतौर से विचार भी नहीं करतीं।
  2. उद्योगपति अपने उद्योगों से होने वाली कमाई का पूरा ब्यौरा ना देकर कुछ काला धन कमाते हैं। कई बार इसका आकार बहुत बड़ा भी हो सकता है। उद्योगपति को इस कालेधन की जरूरत सरकारी बाबूओं, अधिकारियों और मजदूर नेताओं आदि की जरूरतें पूरी करने के लिये होती है।
    1. किसी उद्योगपति के पास कुछ काला होता है तो वह उसका इस्तेमाल नया उद्योग खड़ा करने में करता है जिससे अधिक उत्पादन और रोजगार पैद होता है। भारत जैसी अधकचरी अर्थव्यवस्थाओं में यदि ऐसे काले धन को समाप्त किया गया तो यह उद्योगों के लिये ही विनाशकारी होगा। उद्योग तबाह हो जाएँगे। इस काले धन को समाप्त नहीं किया जा सकता।
  3. कालेधन का एक अन्य प्रकार राजनेता के पास होता है। कई राजनेताओं को राजनीति में बचे रहने के लिए अनेक ऐसे जनकल्याणकारी कार्य करने होते हैं जिनके लिए सरकार से कोई धन प्राप्त नहीं होता। बाहरी दिल्ली का एक प्रसिद्ध युवा नेता अपने व्यक्तिगत पैसे से एक हजार के लगभग वृद्धाओं को मासिक पेंशन देता है।
    1. राजनेताओं का कालाधन एक बुरे काम के लिए भी इस्तेमाल होता है। यह राजनीतिक अस्थिरता और कानूनी अराजकता के लिए भी प्रयोग किया जाता है। उस अवस्था में यह देश-समाज के लिए नुकसानदेह होता है।
    2. राजनेताओं के काले धन के बहुमुखी इस्तेमाल की संभावनाओं के मद्देनज़र इसे पूरी तरह नष्ट करने की सोचना उचित नहीं होगा। राजनेताओं के कालेधन को नष्ट करने की बजाय इसे रेगुलेट करने की सोचनी चाहिए। इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए।
  4. सबसे बुरा कालाधन ब्यूरोक्रेट्स का कालाधन होता है। यह धन आम आदमी के शोषण से पैदा होता है। ब्यूरोक्रेट्स का काला धन आम जनता की परचेजिंग पावर को घटा कर पैदा किया जाता है अतः यह बाजार के खिलाफ काम करता है। दूसरा यह उत्पादन को बढ़ाए विना ही बाजार में (काला)धन झोंक देता है अतः महँगाई को बढ़ाता है। यह ही वह कालाधन है जो स्विस बैंकों की पासबुकों के पृष्ठ सँख्याओं को बढ़ाता है। यही वह कालाधन है जिसको बढ़ाने के लिए बाबू और अधिकारी मिलकर आम जनता के कामों को रोकते हैं और कानूनों की अबूझ पेचीदगियाँ पैदा करते हैं। यह ही वह धन जिसकी मात्रा अकूत होती है। आम आदमी इसी काले धन से त्रस्त होता है। इसी पर लगाम लगाए जाने की जरूरत है।

 

 

कालेधन की समस्या पर काम करने के लिए सरकार को अपनी सोच स्पष्ट करनी होगी- कौन सा कालाधन? वह क्यों पैदा होता है? उसे पैदा करने में वर्तमान व्यवस्था के कौन से तत्त्व जिम्मेदार हैं? पूरी व्यवस्था में कौन से सुधार दरकार हैं जिनके बाद कालेधन की जरूरत ही ना रहे? इन सभी आधारों पर सोचकर ही कालेधन पर कुछ युक्तिसँगत कहा जा सकेगा।

 

इसी दिशा में एक सुझाव यह भी है जितना संभव हो कालाधन अनुमोदित, नियंत्रित या प्रतिवंधित किया जाए और शेष कालाधन जिस पर किसी भी प्रकार का कानूनी आचरण संभव नहीं है उसका राजनीतिक-सामाजिक उपयोग किया जाए। एक ऐसे कोष की संभावना पर विचार किया जा सकता है जो लगभग स्विस बैंको की तर्ज पर हो और जिसमें जमा करवाए गये धन के स्रोत के विषय में कभी भी ना पूछे जाने की गारँटी दी जाए। ऐसे अज्ञात-स्रोत वाले धन के स्वामियों को ब्याज ना दिया जाए बल्कि एक बहुत मामूली सी राशि उनके धन को हिफ़ाजत के साथ सुरक्षित रखनें के लिए उनसे ही ले ली जाए। बस सरकारी नियँत्रण इतना ही हो कि ऐसे जमाकर्ता एक निश्चित समय जैसे एक या दो वर्ष तक उस रकम को खाते में बनाए रखने का वचन दें ताकि सरकार के पास उस धन का एक निरंतर प्रवाह और निवेश बना रहे।

 

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